Wednesday, February 20, 2008

Rang bhar de in kore kagzo par...(Bewfaii 3)

ahhhhh here is another one.......


कब से ये किताब खुली है उसके इंतज़ार में,
की कब वो आए और रंग दे इसके कोरे कागजों को

यह किताब उससे पूछ रही है की,
कब तक मेरे पन्ने कोरे रहेंगे,तेरे रंगो से दूर।
क्या कोरा रहना ही इनकी कीस्मत है?
क्या येही है इनका नसीब?
सुनाई नही पड़ती तुझे मेरी सहमी सी धड़कन ?
नही दिखाई पड़ता क्या तुझे मेरा सूनापन?

नफरत की इस आंधी में,मेरे सब पन्ने फट जायेंगे,
ह्म्म,,,, कोरे थे मेरे कागज़ क्या कोरे ही रह जायेंगे ?
क्यों बनी है यह रंगो से दूरी?
ऐसी भी है क्या मजबूरी ?

आ रंग दे मुझे,आ रंग दे मुझे........
रंग तेरे प्यार का,रंग तेरे सहारे का...
रंग तेरे होने के एहसास का,
रंग मेरी saanso से जुड़ी तेरी saans ka....

रंग दे मुझे अपने रंगो से,
रंग दे मुझे अपने रंगो से

कब से ये किताब खुली है उसके इंतज़ार में,
की कब वो आए और रंग दे इसके कोरे कागजों को

ahhhhh ..

1 comment:

I am back... said...

nice poem...u wern't knowin my poetic side of life,but haha i knew abt urs..keep goin guy!!
hmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm.....
lolz